क्या आप जानते हैं टूटते हुए तारों के विषय में?
अगर नहीं तो आज के पोस्ट में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे।
कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं
साधारण बोलचाल में 'टूटते हुए तारे' अथवा उल्का (meteor) कहते हैं।
प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है।
उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं।
उल्कापिंड़ों की उत्पत्ति का विषय बहुत ही विवादास्पद है। इस विषय पर अनेक मत
हैं जिनमें कुछ में इन्हें पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य और धूमकेतु आदि का अंश माना गया है।
एक मान्य मत के अनुसार एक छोटा ग्रह किसी बड़े ग्रह के अत्यंत निकट आ जाने पर या टकरा जाने से अरबों की संख्या में टुकड़े हो गये जो आज भी उल्का के रूप में खमंडल में विचर रहे हैं ।
कुछ पिंड अधिकांशत: लोहे, निकल या मिश्रधातुओं से बने होते हैं और कुछ सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर सदृश होते हैं।
अभी तक उल्कापिंडों में केवल 52 रासायनिक तत्वों की उपस्थिति प्रमाणित हुई है।
प्रचलित नियमों के अनुसार देश में कहीं भी गिरा हुआ उल्कापिंड सरकारी संपत्ति होता है। जिस किसी को ऐसा पिंड मिले उसका कर्तव्य है कि वह उसे स्थानीय जिलाधीश के पास पहुँचा दे।
उल्कापिंडो का एक बृहत् संग्रह कलकत्ते के भारतीय संग्रहालय (अजायबघर) के भूवैज्ञानिक विभाग में प्रदर्शित है। इसकी देखरेख भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था के निरीक्षण में होती है।
अगर नहीं तो आज के पोस्ट में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे।
कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं
साधारण बोलचाल में 'टूटते हुए तारे' अथवा उल्का (meteor) कहते हैं।
प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है।
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उल्कापिंड़ों की उत्पत्ति का विषय बहुत ही विवादास्पद है। इस विषय पर अनेक मत
हैं जिनमें कुछ में इन्हें पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य और धूमकेतु आदि का अंश माना गया है।
एक मान्य मत के अनुसार एक छोटा ग्रह किसी बड़े ग्रह के अत्यंत निकट आ जाने पर या टकरा जाने से अरबों की संख्या में टुकड़े हो गये जो आज भी उल्का के रूप में खमंडल में विचर रहे हैं ।
कुछ पिंड अधिकांशत: लोहे, निकल या मिश्रधातुओं से बने होते हैं और कुछ सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर सदृश होते हैं।
अभी तक उल्कापिंडों में केवल 52 रासायनिक तत्वों की उपस्थिति प्रमाणित हुई है।
प्रचलित नियमों के अनुसार देश में कहीं भी गिरा हुआ उल्कापिंड सरकारी संपत्ति होता है। जिस किसी को ऐसा पिंड मिले उसका कर्तव्य है कि वह उसे स्थानीय जिलाधीश के पास पहुँचा दे।
उल्कापिंडो का एक बृहत् संग्रह कलकत्ते के भारतीय संग्रहालय (अजायबघर) के भूवैज्ञानिक विभाग में प्रदर्शित है। इसकी देखरेख भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था के निरीक्षण में होती है।

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